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‘‘बिहार में 1975 में जो युवा आन्दोलन शुरू हुआ था, उसकी माँगें थीं - भ्रष्टाचार दूर हो, महँगाई खत्म हो, बेरोज़गारी की समस्या का निवारण हो, शिक्षा की व्यवस्था में आमूल परिवर्तन हो।’’ ‘‘क्या भारत भी दूसरा पाकिस्तान, बांग्लादेश बन जाएगा। इन देशों के पास गांधी, नेहरू, पटेल, राजेन्द्र प्रसाद, मौलाना आज़ाद या राजगोपालाचारी जैसे महापुरुष नहीं थे। क्या इन महापुरुषों का कार्य मिट्टी में मिल जाएगा? ऐसा विश्वास नहीं होता। मैंने कल ही कहा था कि भारतीय लोकतंत्र गर्त से फिर उठेगा।’’ ‘‘संपूर्ण क्रांति की बजाय हम विपरीत क्रांति के काले बादल देख रहे हैं। चारों ओर जिन उल्लू और गीदड़ों के चिल्लाने और गुर्राने की आवाज़ें हम सुनते हैं उनके लिए यह दावत का दिन है। चाहे रात कितनी भी गहरी क्यों न हो, सुबह अवश्य होगी।’’ - इस पुस्तक से जेपी के नाम से लोकप्रिय क्रांतिकारी, समाजवादी, सर्वोदयी लोकनायक जयप्रकाश नारायण की 1975 में लिखी इस डायरी की उक्त पंक्तियाँ पढ़ते हुए लगता है कि पचास साल पहले लिखे शब्द आज की स्थिति पर पूरे खरे उतरते हैं। जयप्रकाश नारायण ने इमरजेंसी के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के विरोध में ‘पूर्ण आंदोलन’ का नेतृत्व किया था जो स्वतंत्र भारत में हुए तब तक के आंदोलनों में सबसे बड़ा था और जिसने सरकार की चूलें हिला दी थीं। उस समय के MISA कानून के तहत इमरजेंसी के खिलाफ़ बग़ावत करने के लिए उन्हें हिरासत में लिया गया और 1 जुलाई 1975 से 15 नवम्बर 1975 तक चंडीगढ़ के पीजीआई अस्पताल में उन्हें नज़रबंद रखा गया। इसी दौरान उन्होंने यह डायरी लिखी। 1947 से पहले वे महात्मा गांधी के साथ ‘सविनय अवज्ञा’ और ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन से जुड़े रहे। स्वतंत्रता पश्चात् उन्होंने ‘सर्वोदय’ और ‘भूदान’ आंदोलनों का नेतृत्व किया। वे आजीवन लोकतांत्रिक सिद्धांतों, न्याय और जनता के कल्याण के लिए संघर्ष करते रहे।
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