किताब के बारे में: चाँद का मुँह टेढ़ा है एक प्रतीकात्मक कविता है जो समाज की विडंबनाओंए विषमता और बौद्धिक संघर्ष को उजागर करती है। इसमें चाँद एक रूपक है कृ सुंदरता और आदर्शों काए जो अब विकृत और असंतुलित हो गया है। मुक्तिबोध आधुनिक समाज की नैतिक गिरावटए राजनीतिक पाखंड और मानसिक द्वंद्व को दर्शाते हैं। वे एक सजग और संवेदनशील लेखक के रूप में अपने भीतर की बेचैनी और खोज को व्यक्त करते हैं। यह कविता आत्मालोचनए विचारधारा और सामाजिक यथार्थ की टकराहट का दस्तावेज़ है जो चेतना को झकझोरती है और बदलाव की माँग करती है।
Author: जी. एम. मुक्तिबोध (G. M. Muktibodh)
Pages: 304
Edition: 1930
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