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‘‘हमारे समय की महत्त्वपूर्ण कथाकार गीताश्री की कहानी ‘दमनक जहानाबादी की विफल गाथा‘ को पढ़ते हुए पाठक एक ऐसी यंत्रणा से रूबरू होता है, जो ‘शबो रोज होता है तमाशा मेरे आगे‘ से आगे जाकर हमारी चेतना को बुरी तरह झकझोरती है। एक आम आदमी ईमानदारी से जीने के अपने संकल्प को बचाये नहीं रख पाता तो, इसलिए कि यह व्यवस्था उसे कोई विकल्प नहीं देती। दमनक, इसी व्यवस्था का शिकार, पटरीवाला दुकानदार है, लेकिन वह अपने बच्चे के अंदर ‘बागो... बागो... कमेती आई... कमेती आई ' का जो ख़ौफ देखता है, यह ख़ौफ जब उसके सपने में भी आने लगता है, तब पाठक बुरी तरह हिल जाता है। इस कहानी के जरिये लेखिका ने दमनक के रूप में एक कॉम्प्लेक्स्ड चरित्र को गढ़ा है, जो ब्लैक एंड वाइट नहीं है। वह अपनी विफलताओं में भी नायक है, क्योंकि वह आम आदमी है, जो जीतने का हौसला रखता है, जो अपनी संतति को ऐसे दुःस्वप्न से मुक्ति दिलाने का संकल्प लेता है। ऐसे समय में जब आज कहानी आकाश कुसुम तोड़ने की होड़ में लगी है, गीताश्री ज़मीन की आमफहम हलचलों के बीच से कोई खदबदाता यथार्थ उठाकर अपनी कहानी का अभीष्ट बनाती हैं।’’ - अवधेश प्रीत वरिष्ठ पत्रकार, लेखक हिन्दी साहित्य में गीताश्री एक महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं जो जमीन और लोक से जुड़ी कहानियाँ और उपन्यास लिखती हैं। ‘दमनक जहानाबादी की विफल गाथा’ नौ कहानियों का संग्रह पाठकों को अवश्य पसंद आयेगा। लेडीज सर्कल, लिट्टी चोखा और अन्य कहानियाँ उनके चर्चित कहानी-संग्रह हैं.
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