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जीवन संवाद में अप्रतिम दार्शनिक तथा शिक्षक जे. कृष्णमूर्ति के साथ उनसे मिलने आये जिज्ञासुओं के संवाद संग्रहीत हैं। उनकी जीवनीकार मेरी लट्यन्स के अनुसार कृष्णमूर्ति की सभी पुस्तकों में यह पढ़ने हेतु सबसे सरल है। प्रकृति के वे वर्णन, जिनसे अधिकांश आलेख आरंभ होते हैं, मन को ऐसे शांत कर देते हैं कि शिक्षा, जो धीरे-धीरे, लगभग अदृश्य रूप से दी जा रही है, सहज ही भीतर उतरती जाती है। ‘‘क्या मैं बस एक प्रश्न पूछ सकता हूँ?’’ औरों में से एक ने कहा, ‘‘व्यक्ति को अपने दैनिक जीवन में किस ढंग से जीना चाहिए?’’ जैसे कि कोई उसी एक दिन, उसी एक घंटे के लिए जीने वाला हो। ‘‘कैसे?’’ यदि आपके पास जीने के लिए केवल एक ही घंटा शेष हो, तो आप क्या करेंगे? ‘‘मुझे वास्तव में मालूम नहीं,’’ उन्होंने चिंतित मुद्रा में उत्तर दिया। क्या आप बाहरी तौर पर जो आवश्यक है, उसे व्यवस्थित नहीं कर लेंगे, आपके मामले, आपकी वसीयत, इत्यादि?, क्या आप अपने परिवार को, और मित्रों को साथ में बुलाकर उनसे क्षमा नहीं माँग लेंगे, यदि आपने उन्हें कोई हानि पहुँचायी हो तो, और उन्होंने भी तो हानि-कष्ट आपको पहुँचाया हो, उसके लिए भी उनको क्षमा नहीं कर देंगे? क्या आप मन की वस्तुओं के, इच्छाओं के तथा संसार के प्रति पूर्ण रूप से मृत नहीं हो जाएँगे? और यदि ऐसा एक घंटे के लिए किया जा सकता है, तो जितने दिन और वर्ष शेष बचे हों, उनके लिए भी किया जा सकता है।
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