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कालजयी कवियों की विशाल काव्य-रचना में से श्रेष्ठतम और प्रतिनिधि काव्य का संकलन विस्तृत विवेचन के साथ प्रस्तुत है। आंडाल दक्षिण भारत की सबसे लोकप्रिय संत-भक्त कवयित्री हैं जिन्हें अक्सर दक्षिण की मीरां भी कहा जाता है। उन्होंने अपनी रचनाओं में आठवीं-नौवीं सदी के दक्षिण भारत के विल्लिपुत्तूर को वृंदावन बना दिया था। उनकी रचनाएँ पति और प्रिय के रूप में भगवान श्री नारायण की कामना, विरह और संयोग पर तो आधारित हैं ही, लेकिन उनमें उस समय के तमिल समाज की परंपराओं, प्रथाओं, प्राकृतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों की भी बहुत जानकारी मिलती है। ‘आलवार’ जिसका अर्थ है ईश्वर में डूबा हुआ, संप्रदाय से आये बारह संत-भक्त कवियों में आंडाल इकलौती स्त्री हैं। तीस पदों में लिखित इनकी रचना ‘तिरुप्पावै’ तमिलनाडु में बहुत ही प्रसिद्ध है जिसे मार्गशीर्ष महीने में घर-घर में गाया जाता है। इस पुस्तक में चयनित रचनाओं का मूल तमिल के हिन्दी अनुवादों पर आधारित भावरूपांतर है। इस पुस्तक का चयन व संपादन माधव हाड़ा ने किया है, जिनकी ख्याति भक्तिकाल के मर्मज्ञ के रूप में है। मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर के पूर्व आचार्य एवं अध्यक्ष माधव हाड़ा भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में फै़लो रहे हैं। संप्रति वे साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली की साधारण सभा और हिन्दी परामर्श मंडल के सदस्य हैं।
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