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About The Product:
‘‘सही फ़रमाया आपने! आप बैठिए!’’ यह कहते हुए मासूम जाना बेगम एक स्वर्णिम सुसज्जित थाली ले आईं, जिसमें हुमा का पंख रखा था। वो पंख जिसे पहनने का हक मुग़ल सल्तनत में केवल शहजादों को ही था। ख़ानेख़ानाँ के पलंग पर बैठते ही महाबानो बेगम ने अपने हाथों से उनके कीमती मुकुट में लटकी सोने की कलगी को निकाल दिया और उसकी जगह हुमा का पंख सजा दिया। हुमा का पंख लगते ही ख़ानेख़ानाँ की भव्यता अपनी विराटता को प्राप्त हो गई।’’ - इस पुस्तक में से अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ को हुमा के पंख से नवाज़ा जाना इस बात का संकेत है कि मुगल बादशाह अकबर के दरबार में उनका कितना रुतबा था। सैन्य-कौशलों में सक्षम और सफल सैन्य अभियानों का नेतृत्व करने वाले अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ मध्यकाल के एक उच्च कोटि के कवि भी थे, जिन्हें कला और सौन्दर्य की गहन समझ थी। ऐसे अद्भुत और दुर्लभ पात्र इतिहास में हमें कम ही मिलते हैं। हुमा का पंख ऐसे ही विलक्षण अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ पर केन्द्रित बेहद पठनीय ऐतिहासिक उपन्यास है। लेखिका उपन्यासकार दीपा गुप्ता ने ‘अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ: व्यक्तित्व, कवित्व एवं आचार्यत्व’ विषय पर रूहेलखंड विश्वविद्यालय, बरेली से पीएच-डी. की उपाधि प्राप्त की है। रहीम पर इनकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हैं। दिल्ली में स्थित हुमायूँ का मकबरा और रहीम का मकबरा के संरक्षण के लिए आगा खाँ ट्रस्ट के साथ मिलकर उन्होंने इन मकबरों का गहन अध्ययन किया है। एमजीएम डिग्री कॉलेज संभल की पूर्व व्याख्याता रही दीपा गुप्ता पिछले पच्चीस सालों से अल्मोड़ा उत्तराखंड में हिन्दी प्रवक्ता के पद पर कार्यरत हैं। हर वर्ष होने वाले अल्मोड़ा लिटरेचर फेस्टिवल की वे डायरेक्टर हैं।
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