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About The Product:
गागर में सागर की तरह इस पुस्तक में हिन्दी के कालजयी कवियों की विशाल काव्य-रचना में से श्रेष्ठतम और प्रतिनिधि काव्य का संकलन विस्तृत विवेचन के साथ प्रस्तुत है। तुलसीदास के बाद उत्तर भारत में सबसे अधिक लोकप्रिय भक्त और कवि हैं विद्यापति। चूँकि इनकी रचनाएँ मैथिली में हैं, इसलिए वे मैथिल कोकिल के नाम से विख्यात हैं। कई बार लोग इन्हें बाँग्ला साहित्य का जनक भी मानते हैं। विद्यापति की ख्याति उनकी मैथिली की शंृगारिक पदावली के कारण है। जहाँ तक उनकी शृंगार-रचना की बात है, उनके मन में देह और काम को लेकर कोई अंतर्बाधा नहीं है। शृंगार के साथ उनकी कविता में भक्ति का भाव भी मिलता है, और इन दोनों का एक साथ होना इसमें अस्वाभाविक नहीं लगता। विद्यापति किसी एक पंथ या संप्रदाय से संबद्ध न होकर वैष्णव, शैव, शाक्त सभी के साथ थे। उनके काव्य में शिव, विष्णु, गंगा, कृष्ण, दुर्गा सभी की स्तुति एक साथ मिलती है। शृंगारिक होने के बावजूद विद्यापति की रचनाओं की पहचान और मान्यता धार्मिक और आध्यात्मिक रूप में भी है। ख़ासतौर पर बंगाल में इनकी रचनाओं को धार्मिक रूप में गाया और समझा जाता है। इस पुस्तक का चयन व संपादन माधव हाड़ा ने किया है, जिनकी ख्याति भक्तिकाल के मर्मज्ञ के रूप में है। मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर के पूर्व आचार्य एवं अध्यक्ष माधव हाड़ा भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में फ़ैलो रहे हैं। संप्रति, वे साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली की साधारण सभा और हिन्दी परामर्श मंडल के सदस्य हैं।
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