Shoodron Ka Sach
शूद्रों का सच' एक ऐतिहासिक पुनर्पाठ है, जो भारतीय समाज में शूद्रों की सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक स्थिति को पूर्णतः भारतीय दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है। यह पुस्तक केवल इतिहास का दस्तावेज नहीं है, बल्कि एक वैचारिक चुनौती है, जो उस मिथक को तोड़ती है कि शूद्र सदा से ही निम्न अवस्था में, अयोग्य और उत्पीड़ित रहे हैं।पुस्तक में तर्क एवं तथ्यों के साथ यह सिद्ध किया गया है कि शूद्र प्राचीन भारत के सम्मानित, शक्तिशाली और विद्वान् वर्ग का हिस्सा थे। अनेक प्रामाणिक ऐतिहासिक सामग्री को खंगालते हुए लेखक इस अवधारणा को भी चुनौती देता है कि शूद्र आर्यों से अलग पराजित जातियाँ थीं। लेखक ने भाषायी, सांस्कृतिक और धार्मिक एकरूपता के अनेक प्रमाणों द्वारा सिद्ध किया है कि शूद्र आर्य मूल के ही अंग थे, न कि कोई आक्रांत जाति। यहाँ स्पष्ट किया गया है कि शूद्र आर्य सामाजिक व्यवस्था के अभिन्न अंग थे, जो केवल सैन्य और प्रशासनिक भूमिका तक ही सीमित नहीं थे, बल्कि वेदज्ञ, यजमान, ऋषि और दार्शनिक भी थे। कवष ऐलुष, सत्यकाम जाबाल, औसिज काक्षीवान आदि अनेक वैदिक ऋषि शूद्र थे।वस्तुतः भारत का आधिकारिक इतिहास जो पाठ्य पुस्तकों में पढ़ाया जाता रहा है, ढेर सारे मौन कराए गए सत्यों का कब्रिस्तान है। 'शूद्रों का सच' उन कब्रों से उठती एक आवाज है। 'शूद्र' शब्द को सैकड़ों वर्षों से अपमान का पर्याय बना दिया गया है, जबकि वह मौलिक रूप से पवित्रता का द्योतक था। उस शूद्र के गौरवशाली इतिहास की यह पुनर्व्याख्या है। यह पुस्तक इतिहास की उन परतों को उधेड़ती है, जिसे सत्ता की छत्रच्छाया में योजनाबद्ध ढंग से दफना दिया गया था।
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Author:Mithilesh K. Singh
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Category:History
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Publisher Name:Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
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Language:Hindi
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Page No.:240
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Publishing Date:01/01/2026
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