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‘‘प्रेमाश्रम किसान-जीवन का महाकाव्य है। उसमें उस जीवन का एक पहलू नहीं दिखाया गया, वह विशाल नदी की तरह है जिसमें मूल धारा के साथ आसपास के नालों का पानी, जड़ से उखड़े हुए पुराने खोखले पेड़ और खेतों का घासपात भी बहता हुआ दिखाई देता है। इसे उपन्यास-रचना के साधारण नियम तोड़कर रचा गया है। कौन है इसका नायक, कौन है इसकी नायिका? प्रेमचंद ने बेगार करनेवाले, हल जोतनेवाले, प्लेग और सरकार का मुकाबला करनेवाले किसानों को नायक बना दिया। प्रेमचंद हमें ठेठ किसानों के बीच ले जाते हैं। उनके अलावा, उनके खेत और ताल, उनके अखाड़े और लावनी-ख्याल, उनके अंधविश्वास और नए जीवन के कसमसाते हुए भावांकुर-प्रेमाश्रम में यह सब कुछ सजीव है, उसके पृष्ठों में इतिहास जी रहा है। प्रेमचंद किसानों की प्राचीन परंपरा दिखाते हैं तो यह भी कि कहाँ उनकी कड़ियाँ टूट रही हैं। प्रेमचंद की कला इस बात में है कि वे हिन्दुस्तान के बदले हुए किसान का चित्र खींच सके हैं। घटनाएँ साधारण हैं लेकिन उनसे वह अपने पात्रों का पुरानापन और नयापन, उनको पीछे ठेलनेवाली और आगे बढ़ाने वाली विशेषताएँ प्रकट करते हैं। पहाड़ की तस्वीर खींचना आसान है, नदी के बहाव को चित्रित करना मुश्किल। प्रेमचंद ने यथार्थ के बहाव को पकड़ लिया है। उसे उन्होंने भावी पीढ़ियों के लिए प्रेमाश्रम में सुरक्षित कर दिया है।’’ - रामविलास शर्मा ‘प्रेमचंद और उनका युग’ पुस्तक से
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