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इस काल के उर्दू कथा साहित्य में तीन प्रवृत्तियाँ प्रमुख हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण प्रवृत्ति प्रेमचंद और अनुकरण करनेवालों जैसे सुदर्शन, अली अब्बास हुसैनी, आजम करीवी और उपेंद्रनाथ अश्क की यथार्थवादी प्रवृत्ति थी। उन्होंने भारत में सामाजिक जीवन की बदलती परिस्थितियों पर नजर रखी। उन्होंने अपनी कथाओं में गाँवों और गाँवों की समस्याओं को प्रमुखता दी। उनका दिल सामान्य व्यक्ति के दुःख और पीड़ा से बेचैन हो उठता था और वह उनके जीवन की परिस्थितियों को इतनी भावनात्मकता से प्रस्तुत करते हैं कि पाठक के मन में उसके प्रति सहानुभूति और हमदर्दी पैदा हो जाती है। उस समय की एक और उल्लेखनीय प्रवृत्ति जीवन की रोमांटिक और भावनात्मक व्याख्या थी। इसका प्रतिनिधित्व सज्जाद हैदर यलदरम, नियाज फतेहपुरी और मजनूँ गोरखपुरी ने किया था। उनकी कथाएँ वास्तविकता से अधिक कल्पनाशील हैं। उनका कथा साहित्य रोमांटिक विचारों और अवधारणाओं से भरा हुआ है। वे मानवीय भावनात्मक संबंधों, विशेष रूप से प्रेम संबंधों को बहुत महत्त्व देते हैं। वे इन संबंधों को सामाजिक परंपराओं और पुराने नैतिक सिद्धांतों और नियमों के बंधनों से मुक्त करना चाहते हैं। तीसरी प्रवृत्ति उन लोगों की है, जो सुधारवादी दृष्टिकोण से मुसलमानों के मध्यम वर्ग की घरेलू समस्याओं को प्रस्तुत करते हैं और इनमें प्रमुख नाम नजीर अहमद, सुल्तान हैदर जोश, राशिदुल खैरी और अजीम बेग चुगताई आदि के हैं; जिन्होंने अपने स्वयं के अवलोकन और अनुभवों पर प्रकाश डाला है। उन्होंने मुस्लिम समाज को अलग-अलग प्रकार से अपनी कल्पनाओं का विषय बनाया।
Language: Hindi
Page No: 176
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